तेरी कह के लूंगा

वित् मंत्री ने आज लोक सभा में अपना बजट पेश किया है, जहाँ उन्होंने ये दावा किया की ये बजट लोगों के लिए काफी किफायती है ।पर क्या वाकई में ऐसा है ? क्या ये सभी वर्गों के लिए हितकारी है ?बिलकुल ही,ये ऐसा नहीं है। इस बार के बजट में जहाँ गरीबों को कई तरीकों से निचोड़ा गया है, वहीं ऊपर तबके के लोग यानी की बिजनेश क्लाश या फिर कोर्पोरेट जगत को फायदा पहुँचाने का माजड़ा सामने आया है ।गैंग्स आफ वासेपुर का गाना एक गाना भी है ..तेरी कह के लूँगा ।सरकार ने गरीबों को बिलकुल कह के ले लिया है । उधर महाराष्ट्र में किसान कताऱों में आत्महत्या कर रहे थे... तो कोई उन्हें बचाने वाला नहीं था ...वहीं वित् मंत्री लोक सभा में जमीन अधिग्रहण बिल पर संशोधन पेश कर रहे थे ।क्या ये संशोधन काऱगर साबित होगा ? मुझे नहीं लगता की ऐसा कुछ होगा ।इस बिल में साफ-साफ पुंजीपतियों को फायदा पहुँचाने की फ़जिहत सामने आयी है ।चाहे वो जमीन अधिग्रहण का बिल हो या फिर कोई औऱ ।दाल में कुछ काला होने की बात तब सामने आयी जब बजट के कागजों की हेरा-फ़ेरी हुयी थी ।और भी तब..जब ये पता चला की इन कागजों की दलाली की जा रही है जिसमें कोर्पोरेट जगत के कई लोग भी शामिल हैं । साफ मालूम होता है की पूंजीपति ताकतों का गठजोड़ गरीबों का बहिष्कार करना चाहता है ।ये कहाँ तक सही है..खासकर तब, जब प्रधानमंत्री ने गरीबी को न्यूंतम स्तर तक ले जाने की बात कही हो । मेरे मित्र गुप्ता जी भी इस बिल से खासा नाराज मालूम होते हैं ।हालाँकी वो मध्यमवर्गीय व्यक्ति हैं...फिर भी कर दरों की वृद्धि ने उनका दिमाग चकऱा दिया है ।उधर पेट्रोल और डीजल दरों की वृद्धि ने अलग उन्हें परेशान कर रखा है ।वे कहते हैं –भाई मयंक एक तरफ ये महंगाई और दूसरी तरफ पत्नि की पिटाई...दोनों ने हालत खराब कर रखी है । चलिए गुप्ता जी को उनके हाल पे छोड़ देते हैँ और बात करें अब उन किसानों के बारे में जिनके पास खेती के सिवा कुछ रखा नहीं है, करने के लिए ।खेती ही उनका शौक है और पेशा भी ।बगल में अगर शाहरूख़ का सिनेमा भी लगा हो, फिर भी वो काम के शिवा सिनेमाघर जाना पसंद नहीं करेंगे ।उन्हें कैसा लगेगा जब उनको ये मालूम होगा की पूंजिवाद लोग उनके जमीन पर कल-काऱखानों की दुकानें चलाना चाहते हैं ।फिर वो शायद जरूर ऐसा सोचें की इससे अच्छा वो सिनेमाघर ही चले जाते । अब ऐसा भी मालूम होने लगा है की सरकार सामंतवाद की जड़ों को तो उखाड़ रही है ..पर उसके बदले में वो पूंजिवाद को भी जन्म दे रही है ।एफ.बी.आई का तो नाम सुना था..पर वो क्यों एफ.डी.आई को वेलकम कर रही है ।ये तभी मालूम होगा जब हम इसकी जड़ों तक जाएंगे । धन्यवाद

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