प़ड़ोस के गुप्ता जी की कलम से,
लाईक के जमाने में अन-लाईक होना पड़ रहा है
।पत्नी को घर में छोड़कर ..बाहरवाली के साथ धूमना पड़ रहा है ।मच्छर इतने.... की
काटे सपने में आकर भी....साला दिन के समय में भी आल-आऊट लगाना पड़ रहा है ।सपने आते
थे कभी शेर-चीतों के...पर अब आते हैं तो सिर्फ मच्छरों के ।जिंदगी ऐसे जैसे घर की
हो टूटी हुई किवाड़ी...अब तो दिवाली में भी बिवी के लिए आती नहीं है एक साड़ी ।
जिंदगी जैसे दाल में हो नमक कम ...और सब्जी
में हो न दम.. फिर भी चलाता हूँ इसे जैसे लाईफ में कोई नहीं हो गम।तब भी लगता है
डर...की बिना पैसे के खा जाए ना कर्जे का घर।पढ़ाई की पर.. बिना खाते का चलना पड़
रहा है.....यहाँ तो अंगूठा लगा कर भी लोग एकाऊँट खोल रहे हैं ।
अब तो आड़ोस-पड़ोस में आए कोई सही ,मेरी लाईफ
में दही जमाए तो सही । की अब तो पड़ोसी भी जाग-जागकर हमारी लड़ाई देखने लगे हैं...
साले मोहल्ले के कुत्ते भी हमें देखकर ज्यादा भूंकने लगे हैं।
कास पैसा पास होता ... तो घर साफ
होता..किवाड़ी ठीक होता..बीवी का डाँट हाफ होता....और ये बंदा भी टीप-टाप होता ।
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