दाल में कुछ काला है


चुनावी मतभेद को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे की दाल में कुछ काला है ।क्यों ऐसा होता है की जो नेता कल तक एक दूसरे की बुराई करने में लगे रहते हैं,अचानक बहुत अच्छें दोस्त हो जाते हैं ?क्या वो वाकई में एक-दूसरे के दुश्मन हैं या सिर्फ  एक नाटक का हिस्सा हैं, जो हमारे आँखों के सामने आकर सत्य जैसा प्रतीत होता है ।
कभी कोई झा ,तो कभी कोई तिवारी,हर कोई जैसे नाटक कर रहा है ।इस नाटक को  देखने के लिए हमने पैसे भी खूब बहाए हैं और नाटक है जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है
पर मैं निराश नहीं हूँ, कोई न कोई इस कहानी का अंत करेगा और हम अपनी सीट से उठकर बाहर जाऐंगे ।कोई तो होगा जो इसे एक नाटक के तौर पर नहीं बल्की एक क्रिकेट के लाइव मैच जैसा ले जिसे जीतने के लिए सभी खिलाड़ी का अच्छा प्रदर्शन करऩा बहुत जरूरी है ।
खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन से दर्शक-दीर्घा में बैठे लोग काफी खुश होते हैं ।दर्शक यानी हम लोग और खिलाड़ी यानी की ये ऩेता ।हम मैच में पैसा लगाकर भी खुश होते हैं क्योंकि हमें लगता है की हमारा पैसा देना सफल हो गया है ।भले ही हम हारे चाहें जीते पर अगर हम मेहनत करेंगे तो कोई निराश नहीं होगा ।

फिर मेहनत करने के बाद हार ही क्यों न मिले ।

picture courtsey: wordpress.com

Comments

Popular posts from this blog

सड़क का डॅान कौन ?