क्या बचा पाएगी "आप" अपनी शाख़ ?
"आप" के अंदर ,हाल ही के दिनों में उठे विवाद
के बाद पार्टी को सतर्क हो जाना चाहिए ।अभी कुछ ही दिनों पहले उन्होंने योगेंद्र
यादव, प्रशांत भूषण,अजीत झा और आनंद कुमार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी टीम
से निकाल दिया,जिसके बाद उम्मीद लगाई जा रही है कि पार्टी काम पर ध्यान देगी ।उधर
उन्होंने, एडमिरल रामदास को भी पार्टी के आंतरिक लोकपाल पद से बर्खास्त कर दिया
है,और मेधा पाटकर पहले ही पार्टी छोड़ चुकी हैं ।
इन सब के बाद केजरीवाल को सबसे
पहले, पार्टी को एकजुट करना होगा जो कतई आसान नहीं है ।उधर लोगों के भीतर भी,
पार्टी की इस नई छवि को लेकर ठेस जरूर पहुँचा है ।जो पार्टी कभी एक वक़्त दूसरी
पार्टियों को एकजुट होने की नसीह़त दिया करती थी, आज उन्हें खुद उसी चीज की जरूरत
आन पड़ी है ।
उधर दिल्ली चुनाव के पहले, लोगों से किए गए
वादों को पूरा करने में उनकी कामयाबी भी दांव पर है ।क्या वे दिल्ली की जनता से
किया गया वादा पूरा कर पाएँगे, या नहीं ? ये देखना अभी बांकि है
।

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