यहाँ पक्षीयाँ रोती हैं

      
मैं देख रहा हूँ उस शहर को जिसका वजूद जैसे मिट सा गया है ।एक समय ये शहर हमेशा हँसा करता था लेकिन अब वो  उदास  है ।एक समय इस शहर में इंसान भटका करते थे पर अब सिर्फ उनकी यादें ही भटक रही हैं।ये शहर अब सिर्फ पक्षियों का बसेरा है जो गुम हो गए इंसानियत के वजूदों की तलाश कर रहा है ।

इस दंगों ने हस्ती मिटा डाली है,एहलेवतन उजाड़ दिए हैं,कम्बख्त अब इन पेड़ की शाखाओं पर पंक्षियों ने भी बैठना बंद कर दिया है क्योंकि इस दुश्मनी की आग ने इनके जड़ों तक को जला डाले हैं ।
      देखता हूँ मैं तो घृणा होती है मुझे अपने आप से ।
     पूछता हूँ की क्या इंसान कहलाने लायक हैं हम, जब ये सब होते आ रहा है खुलेआम में ।।

अब इस सड़क पे सिर्फ पंक्षियाँ ही आती हैं क्योंकी इंसानों ने अपने वजूदों को मिटा डाला है बड़े आराम से ।।

जहाँ इस मजहब और जातिवाद ने हमें आपस में लड़ना सिखाया है,तो वहीं इन खामियों की नासमझ ने उन्हें एक दूसरे को अपनाना सिखाया है ।जहाँ धर्म और जातिवाद हमारे कतऱे-कतऱे में वाकिफ़ है,तो पक्षियों ने इसके बिना भी हमें हंसना सिखाया है ।

इस सड़क पर जहाँ खून श्याहियों के तरह बिखड़े पऱे थे,अब उस जगह पर चिड़ियाँ सिर्फ दाना चुगने आती है ।लेकिन अब पंक्षियाँ रो रही हैं,पता है क्यों ? क्योंकि अब इनको दाना देने वाला कोई बचा ही नहीं है।सारे दाना देने वाले तो चले गए हैं ।आखिर इंसान गए तो गए कहाँ ?

उस घरों के टंगे आईनों में पक्षियों ने अपनी परक्षाईयाँ देख ली है पर इंसानों को नहीं ।उस घर के दीवार पर लगे खून के छींटों को तो उन्होंने देख लिया है पर इंसानों को नहीं ।उस मरमराती हुइ दरवाजे के पीछे टंगी लाश को तो उन्होंने देख लिया है पर इंसानों को नहीं ।इंसान तो लुप्त हो गए हैं पर पंक्षियाँ ?पंक्षियाँ तो विलुप्त होंगी क्योंकि इंसान तो है ही नहीं ।और इसलिए वे रो रही हैं।

धन्यवाद


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