हिमालय पे बिताए वो सात दिन
अक्सर ही तस्वीरों में हिमालय के दृश्य देखकर , बहुत ही अनूठा प्रतीत
होता था ।पर जब मुझे वहाँ जाने का मौका मिला...तो लगा जैसे कि वे दृश्य और भी
ज्यादा मनमोहक हो गए हैं ।मुझे ऐसा एहसास हुआ,मानो मैं कल्पना के सागर में हिचकोले
खा रहा हूं ।वहाँ पे बिताए हुए मेरे सात दिन मेरे यादगार पलों में सिमट से गए हैं
।हर एक लम्हा जैसे मुझमें समाहित होता प्रतीत हो रहा है ।
अपने पहले दिन ही मैं वहाँ की सुंदरता में मानों खो सा गया ।तस्वीरों
के सागर में उसकी उभरने वाली छवि सामने से देखने पर और भी मनोरम सिद्ध होगी, इसका
एहसास मुझे पहली दफा यहीं हुआ ।क्या मैं इसे प्रकृति की एक कल्पना मानूं या फिर इसकी
जादूगरी ।जो हो मैं इसमें खो सा गया हूं ।
जो हिमालय की गोद में अपना बसेरा बनाए हुए हैं, उनके अनुभवों को अपने
में समेटने से अधिक मूल्यवान कुछ भी नहीं ।हम शहरों में रहने वाले, बच्चों के तरह
एक-दूसरे से झगड़ने वाले क्या जाने यहाँ की मिठास को ।पर ये लोग जो अपना गुजड़ ही
पहाड़ियों की तंदराओं में करते हैं ,उनसे मिलकर ही मुझे पहली बार हिमालय की
खूबसूरती पर कस़ीदें लिखने का दिल किया ।दुसरे दिन का ये अनुभव मेरे दिल के बेहद
करीब है ।
वो दूर से किसी पेंसिल के नोंक जैसी उभरने वाली हिमालय की चोटियां,
अगर पास जाने पर किसी खुबसूरती का इजहार करे,तो उसे एक बार तो गले लगाना बनता ही
है ।इसी वजह से हमने तीसरे दिन इस पर चढ़ाई की ।चढ़ाई कठिन थी ,पर आनंद का शबाब
अगर आपके रक्त में मिल जाए तो वह एक नया जोश पैदा कर देता है ।
वो यूं कुछ पता नहीं चला कब चौथा दिन करीब आ गया ।होश तब खुली जब सूरज
ने हमें आकर जगाया ।सब कुछ छोड़कर हम थे पहाड़ियों के ऊपर और सर पे था वो निला
आशमान ।खुली हवा मानों बदन से टकराकर उसे उर्जा दे रही हो ।पक्षियों की चहचहाहट
मानों कानों के पर्दे से छनकर सुर की लता पिंड़ो रही हों ।
सपने जैसे बिखर गए हों टूटकर,आख़िर हिमालय की गोद से आना ही पड़ा नीचे
उतरकर।जैसे माँ ने उतार दिया हो किसी छोटे से बच्चे को गोद में भड़कर ।ऐसा ही लगा
वहाँ से नीचे आकर ।पांचवे दिन की ये कड़वाहट कम्बख़्त जाती ही नहीं चाहे कितना भी
मिटाना चाहूं इसे भुलाकर ।
वो छ:ठा दिन मानों लगा मुझे साल का हो आखिरी दिन ।अब कल जाना
होगा, लौट के न जाने कब आना होगा ।ठाना है मन में तो निभाऊंगा, वादा करता हूं
तुझसे कि लौट कर जरूर मिलने आऊंगा ।फिर भी अच्छा लगा जब देखा हिमालय से बहते हुए
उस झड़ने को ।मानों ताजगी सी आ गयी ।खो गया फिर इसकी खुबसूरती में ।
वो दु:ख है मुझे की सांतवा दिन
सिर्फ बिता सेल्फी खींचने और खींचवाने में ।पर करता भी क्या, और कुछ बचा भी नहीं
था वहाँ ऐसा करने और करवाने में ।वहाँ के अनुभवों को समेटना भी जरूरी ही था,सो
किया।
अब छ:ह महीने और सात दिन बाद
फिर जा रहा हूं वहाँ घुमने को ।साथ में है, अब मेरी महबूबा भी ।
चित्र शिष्टाचार :www.wikipedia.org

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