टिंकू की साईकिल
कल सुबह ही टिंकू के पापा ने उसके लिए एक नई
साईकिल खरीद कर लायी है ।साईकिल को देखकर टिंकू काफी खुश है ।उसके मन में ये चल
रहा है की वो कैसे साईकिल को अपने घर में दौड़ाएगा ।साईकिल की खुशी टिंकू के मन
में तरह-तरह के विचार ले कर आ रही है ।उधर टिंकू को ये भी पता है उसे पढाई में
ज्यादा ध्यान देना होगा, वरना आगे से उसके पापा उसे नई चाजें लाकर नहीं देंगे
।टिकू के पिताजी भी उसे इसी तरीके से उसे प्रोतसाहित किया करते हैं ।टींकू की
मम्मी के गुज़र जाने के बाद उसके पिता ने उसका पूरा ख्य़ाल रखा है ।
अचानक टिंकू की आँखें खुलती हैं और वो देखता है
की वो एक अंजाने जगह पर है ।नई दीवारें,नई तस्वीरें और भी बहुत कुछ ।ये समूचा
स्थान ही उसके लिए बिलकुल नवीन सा प्रतीत हो रहा है ।वहाँ न तो उसकी साईकिल है और
न ही उसके पापा ।अचानक ही वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगता है ।उसकी इस चिल्लाहट की
आवाज सुनकर एक व्यक्ति भागता हुआ अंदर आता है ।टिंकू जो महज चौदह साल का है ,दर्द
भऱे शब्दों में उस व्यक्ति से उसका नाम और यहाँ पर खुद की उपस्थिती के बारे में
पूछता है ।
अनुवेश नाम का वह व्यक्ति पहले तो टिंकू के समक्ष खुद
का परिचय देता है, फिर उसे बताता है की कैसे कुछ व्यक्ति उसे अस्पताल से यहाँ छोड़
आए हैं ।वह और पूछता है तो अनुवेश उसे उसके सवालों के उत्तर हेतु अस्पताल ले जाता
है ।अस्पताल जाने के रास्ते में एक मोड़ उसकी यादों को अतीत में ले जाती हैं ।चाह
कर भी वो अपनी ऐसी हालत का संज्ञान नहीं कर पा रहा है ।उसका मन एक अनुपात के बाद
आगे सोच नहीं पा रहा है ।
इसी मानसिक कमोवेश में रास्ता कब कट गया और
अस्पताल कब आ गया कुछ पता नहीं चला।अनुवेश उसे एक कमरे में ले जाता है जिसकी
दीवारें तस्वीरों को अपने गले का माला बनाए हुए है ।टिंकू की नज़रें बरे गौड़ से
उन तस्वीरों को देखती है,पर एक तस्वीर पर आके रूक जाती हैं ।आँखो से आंसू तो निकलना
अनिवार्य ही है..जो इस बात का प्रमाण है की अब उसके पिताजी इस दुनिया में नहीं रहे
।
उस कमरे से निकलते वक्त एक गलियारे में उसके कदम
अचानक रूक जाते हैं ।बगल ही में उसकी साईकिल है ।फिर क्या, उसके च़हरे पर एक
मुसकूराहट उभरती है..और वह कुछ देर उस साईकिल को ही चलाता है ।
जब उसका मन भर जाता है तो अनुवेश वापस उसे घर ले
जाने लगता है ।रास्ते में फिर उसी मोड़ ने टिंकू के मन को एक बार फिर थका दिया है
।पर इस बार उसे सब याद आता है ।उसे याद आता है की कैसे पिकनिक के लिए जाते वक्त ही
उसका और उसके पापा का एक्सिडेंट हो जाता है ..जिसके बाद वो दोनों अस्पताल पहुँच
जाते हैं ..और फिर....
वो अनुवेश से बोलता है –आप मुझे रोज-रोज अस्पताल
न लाया करो..मुझे पता है की सिर्फ यही तरीका है मेरी मानसिक स्थिती को ठीक करने
का.. जब मैं सुबह जागता हूँ तो मुझे कुछ याद नहीं रहता..फिर यहाँ आकर सारी कहानी
समझ में आ जाती है...पर अब मैं ठीक हो चुका हूँ ।
अनुवेश जिसने उसके पापा के गुज़र जाने बाद उसे
गोद ले रखा है ,सिर्फ यही सोचता है की काश उसकी बातें सच हों ।
मयंक झा
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