काम ही काम


काम ही काम..काम ही काम
इसका मिलेगा नहीं कुछ दाम और न ही कोई ईनाम....
फिर भी काम ही काम ।

याद है मुझे वो महबूबा के साथ बिताया हुआ शाम....और वो मेज पे पड़ा हुआ जाम..
पर डर लगता है की कहीं सपने में भी नहीं आ जाए ये काम ।

ये भी चाहता हूँ की अगर काम अच्छा हुआ तो लोग लेंगे मेरा नाम..
लेकिन सोंचता हूँ की वो लेंगे क्यों...न ही मैं हूँ कोई कबीर और न ही कोई राम..
फिर भी आदत है करते रहने का सिर्फ काम..सिर्फ काम

मयंक झा





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