“दम लगा कर हैसा” ने पर्दे पर दिखाया अपना दम


कहानी की शुरूआत करते हैं बऱे ही निम्न परिवार से जहाँ बाप,माँ बेटा और बुआ रहते हैं।जहाँ बेटे को कुमार शानु के गानों का शौक है,बाप को बेटे को मारने का,माँ को बेटे की गृहस्थी का और बूआ को नुश्ख निकालने का । फिल्म के शुरूआत में ही प्रेम तिवारी की शादी संध्या वर्मा से हो जाती है, जिससे उस परिवार को एक बहु मिल जाती है और एक नया सदस्य भी ।बेटा( प्रेम तिवारी-आयुष्मान ख़ुराना) जो शादी के लिए अभी अपने आपको परिपक्व नहीं समझता है...किसी तरह परिवार के समझाने पर इसके लिए मान जाता है ।बाद में कुंठा होती है उसे.. जब उसकी मुलाकात होती है अपनी बीवी(संध्या-भूमी पेडनेकर) से ।

साईज में थोड़ा ज्यादा ,बीएड की डीग्री और देखने में ठीकठाक ..प्रेम के परिवार को उससे  ज्यादा क्या चाहिए ।पर प्रेम को ये मंजूर नहीं है ।प्रेम ने बग़ावत करने का मन बना लिया ।बस फिर क्या ...उसने अपने और संध्या के रिश्ते को नकारऩा शुरू कर दिया और कहानी में आया एक नया मोर ।दोनों के बीच में तलाक़ तक की नौबत आ जाती है ।उधर शहर में आती है दम लगाकर हैसा प्रतियोगिया...जिसे जीतकर ही प्रेम अपनी खोई हुई ईज्जत पा सकता है ।

पर इसके लिए उसका संध्या का साथ जरूरी है ...क्योंकि इस प्रतियोगिया में पति- पत्नि दोनों साथ दौड़ लगाते हैं ।जितने वाले को मिलता है एक ट्राफी और कुछ और ईनाम ।अब देखना ये है की प्रेम तिवारी ये दौड़ जित पाता है भी या नहीं ? उधर दोनों के बीच के रिश्तों का क्या होता है ? ये भी देखना दिलचस्प होगा ।

कहानी हर तरीके से आपको पात्रों से जोरे रख़ती है ।अनु मलिक का संगीत प्यारा है...बिलकुल 90 दसक की याद आती है ।सारे किरदारों ने भी कुल मिलाकर अच्छा काम किया हैं ।सिनेकला भी प्यारी है ।सऱत कटारिया का निर्देशन अच्छा है ।

मेरी तरफ से इस फिल्म को पाँच में से साढ़े तीन अंक ।

धन्यवाद




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