कब दोगे इन्हें आज़ादी !



जी हाँ, ये मेरी लेख का विषय है जो इस बात की इख्त़िलाह कर रहा है कि, किसानों की मजबूरीयों का अंत निश्चित है भी या नहीं ? हर ओर, किसानों की बदहाली का गवाह बनता ये समाज हमें बता  रहा है कि उनकी लाशें इधर-उधर बिखड़ी पड़ी हैं ।और कोई , उनको उठाने वाला भी नहीं है यहाँ ।ऐसा क्यों है कि जिन किसानों द्वारा ये सींचित अनाज हमारा आहार है, उन किसानों के लिए हमारी बेपरवाही हम अपने कंधों पर ढो रहे हैं ।जिस भोजन के स्वाद पर हम उसकी तारीफ करते हैं, उसी को सींचने वाले की कवायद हम अक्सर भूल जाते हैं ।यहाँ तक कि , सरकार जो चुनाव रूपी उन पुलों को पार कर अपनी हस्ती बनाने चली है, उन्हें भी अंदाजा नहीं होगा उन निष्क्रिय होते आ रहे उनके चुनावी वादों का ।

हम कानूनों में प्रावधान कर ये सोच लेते हैं कि हमारा दायित्व पूरा हो गया , पर उसके क्रियान्वयन को अक्सर ही हम भूल जाते हैं।उधर हम जैसे आम व्यक्ति भी ख़बरिया चैनलों में आयी हुई इस विषय से संबंधित चर्चा के बाद, इसे आपसी मुद्दा समझ कर भूल जाते हैं ।हालांकि कई लोग उन किसानों की बदहाली पर आँसु बहा रहे हैं , पर उनका जनसमूह काफी निम्न है ।

अभी कुछ ही दिनों पहले, किसी अख़बार ने एक किसान के आत्मदाह वाली तस्वीर छांपी है ।उस तस्वीर में उसका शरीर जला हुआ है ।साफ पता चल रहा है, कि उसने खुद को जला लिया है ।इतना सब होने के बाबत भी अगर किसी बदलाव का निर्वहण नहीं हुआ, तो शर्म के सिवा और कुछ बचा भी क्या है ।

ये किसान अपनी आज़ादी की मांग कर रहे हैं, जो शायद इनकी तकलीफ़ों का निवारण है ।अगर ऐसा नहीं हुआ, तो वे इसी तरह जिंदगी से आज़ादी लेते रहेंगे ।

धन्यवाद

फोंटो आभार :times of india.indiatimes.com





  




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